रोड टू स्टारलाइट (3/3) पीटी 4

शाम 6:30 बजे

कई घंटे गुजर चुके थे, और लौटते वक्त की फ्लाइट मेरे अंदाज़े से कहीं ज़्यादा शांत थी। इतनी थकान के बाद मैं बस यही ठान चुकी थी कि इन मुलायम चमड़े की सीटों पर ही पड़ी रहूँगी और अब कभी हिलूँगी भी नहीं।

मैं काइलन के बगल से टिक गई, सिर उसके कंधे पर। उसके मुँह से एक जम्हाई निकल गई। लगता थ...

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